भारतीय संविधान की प्रस्तावना में प्रमुख शब्द “हम भारत के लोग…. सार्वभौम, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य” हैं। भारतीय संविधान के सबसे पवित्र शब्द हैं। ये वह शब्द हैं जो भारतीय गणराज्य के लोकतांत्रिक, पंथनिरपेक्ष व समाजवादी स्वरूप को प्रकट करते हैं। यह सभी जानते हैं कि संविधान की प्रस्तावना संविधान की उद्देशिका होती है जो संविधान में उल्लेखित सिद्धांतों का मार्गदर्शन करती है।
संविधान के उद्देश्यों एवं आकांक्षाओं को जानने की कुंजी है, अतः कि माननीय उच्चतम न्यायालय के बहुचर्चित केस केस “केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य” 1973, एवं 1960 यूनुस भाई बनाम स्टेट ऑफ बॉम्बे में प्रमुख रूप से अभिमत व्यक्त किया गया है। संविधान की प्रस्तावना को समझे बिना संविधान की व्याख्या अधूरी रहेगी।
गोलकनाथ बनाम स्टेट ऑफ पंजाब (1967), केशवानंद भारती (1973) एवं मिनर्वा मिल्स बनाम भारत सरकार (1980) में यह माना गया कि संविधान की प्रस्तावना संविधान का आवश्यक हिस्सा है।
संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत 42वां संविधान संशोधन अधिनियम 1976 पारित किया गया, जिसके द्वारा संविधान की प्रस्तावना में दो नए शब्द ‘समाजवाद’ व ‘पंथनिरपेक्षता’ को शामिल किया गया। जबकि यह शब्द संविधान सभा द्वारा लिखे संविधान में नहीं थे।
संविधान निर्माण के समय संविधान सभा ने इस बात पर बहस की थी कि ‘हम भारत के लोग’ शब्द संविधान की प्रस्तावना में रहेंगे या नहीं। इस पर यह सहमति बनी कि ‘हम भारत के लोग’ यह भाव संविधान की आत्मा है। यह पंक्ति यह स्पष्ट करती है कि देश की सत्ता का अंतिम स्रोत देश की जनता है, न कि कोई राजा, महाराजा या शासक वर्ग।
वर्तमान में इन मूल शब्दों की व्याख्या को लेकर भ्रामक स्थिति बन गई है, जब इनके दुरुपयोग द्वारा व्यक्तिगत हितों को साधने की कोशिश की जाती है।
‘हम भारत के लोग’ संविधान के स्रोत के रूप में –
हम भारत के लोग शब्द यह उद्घोषित करते हैं कि भारत एक गणराज्य है और यहां संपूर्ण सत्ता असामाजिक तत्वों पर आधारित न होकर, जनभागीदारी और निर्वाचित नेतृत्व के माध्यम से चुनी जाती है।
‘हम भारत के लोग’ यह भी बताता है कि हम भारत के लोग ही संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं। इसका अर्थ यह है कि संविधान न तो राजा द्वारा दिया गया है और न ही शासक वर्ग द्वारा। संविधान की सभी शक्तियां भारत की जनता से निहित हैं।
भारत का संविधान जनता के लिए जनता द्वारा ही बनाया गया है। जनता को ही उसका अंतिम लक्ष्य माना गया है और उसी के द्वारा संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित किया गया है।
‘हम भारत के लोग’ समूह के रूप में –
भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने संविधान सभा की बैठक में 11 दिसम्बर 1946 को अपने अध्यक्षीय भाषण में यह उद्धरण प्रस्तुत किया था कि–
“हमें यह जानना है कि उन परिस्थितियों के होते हुए भी यह कार्य एक लोकतंत्र निष्पक्ष के रूप में अपनाया भारत स्वतन्त्र और अपने निर्णय स्वयं लेने। हमारा संविधान सभी लोगों को अधिकार देता है समान रूप से कार्य करने। किसी विशेष वर्ग को अनाधिकारित रूप से शक्ति का स्रोत संविधान नहीं मानता। संविधान शक्ति का स्रोत है जनता के हाथ में और जनता के पक्ष में।”
संविधान की प्रस्तावना ‘हम भारत के लोग’ इस मूल आत्मा को स्पष्ट करती है। भारत एक लोकतांत्रिक गणराज्य है। यह गणराज्य व्यवस्था और प्रणाली को सुनिश्चित करता है। संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित एवं आत्मार्पित करने का निरूपक किया है ‘हम भारत के लोग’ यह वाक्य। यह वाक्य समूहवाद, सहमति, सहभागिता और सार्वभौमिकता को स्पष्ट करता है। इसका उद्देश्य है कि लोकतंत्र, समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता जैसे मूल तत्व संविधान में निहित हों और संविधान के निर्माण में सभी लोगों की भागीदारी हो।
अतः अप्रत्यक्ष रूप से भारत की सम्प्रभुता हम भारत के लोगों में ही निहित है।
“हम भारत के लोग और लोकतंत्र”
हम भारत के लोगों का तात्पर्य भारत को एक लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने से है। अतः इसकी शासन व्यवस्था और प्रणाली की निर्माण में सभी वर्गों के लोगों को भागीदार किया गया है तथा ऐसी व्यवस्था की गई है जिससे सरकार का चुनाव समय समय पर देश की नागरिकता किया, उनके हितों, उनके निर्णय, उनकी इच्छा में ही सूझी जा सके और समस्त देश की सरकार के निर्माण में उनकी भूमिका सुनिश्चित की जा सके।
हम भारत के लोग वाक्य लोकतंत्र की आत्मा का प्रतीक है। यह भारत की शासन व्यवस्था को लोकतांत्रिक दृष्टिकोण से संचालित करने की सूचना एवं संकेत का कार्य करता है। इसकी लोकतांत्रिक दृष्टिकोण को सजीव बनाये रखने के लिए संविधान की प्रस्तावना में ही इसे स्थान दिया गया है।
संविधान के अनुच्छेद 19 में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 38 व 51 को नीति निर्देशों हेतु मार्गदर्शक के रूप में संविधान ने मार्गदर्शन दिया है।
संविधान के लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के माध्यम से लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना का संकल्प किया है।
“हम भारत के लोग” और समाजवाद”
संविधान निर्माण के समय समाजवाद शब्द संविधान की प्रस्तावना में नहीं था। परंतु 42वें संविधान संशोधन के द्वारा दिनांक 03.1.1977 को समाजवाद शब्द को संविधान की प्रस्तावना में अंकित किया गया।
समाजवाद की अवधारणा का अर्थ है सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय में साम्य स्थापित करना।
यह ऐसी शासन प्रणाली है जिसमें समाज के सभी वर्गों के कल्याण हेतु सत्ता एवं शासन निहित हो। इसका मुख्य उद्देश्य आर्थिक समानता और सम्पत्ति का न्यायिक वितरण है। संविधान निर्माताओं द्वारा इसे स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व और न्याय के साथ प्रस्तुत किया गया है।
समाजवादी दृष्टिकोण को अपनाकर ही हम निर्धन, शोषित, वंचित एवं उपेक्षित वर्गों को न्याय दिला सकते हैं और समता के सिद्धांत को मूर्त रूप दे सकते हैं। संविधान की प्रस्तावना में इसे जोड़ने का मुख्य उद्देश्य यह था कि भारत को एक समाजवादी राज्य घोषित किया जाए।
‘हम भारत के लोग’ शब्द इस बात को प्रमाणित करता है कि समाजवाद की परिकल्पना जनता से उत्पन्न हुई है और इसे संविधान में स्थान दिया गया है।
संविधान सभा में डॉ. अंबेडकर ने भी कहा था कि– “संविधान को इतना लचीला बनाया गया है कि समयानुसार इसमें बदलाव किया जा सके और समाजवाद की स्थापना की जा सके।”
संविधान की 25वीं वर्षगांठ के अवसर पर माननीय उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति केशवानंद भारती बनाम स्टेट ऑफ केरल 1973 में यह कहा गया कि–
“भारत एक समाजवादी गणराज्य है और समाजवाद भारत की शासन प्रणाली का एक आधारभूत हिस्सा है।”
अतः संविधान की प्रस्तावना का वाक्य “हम भारत के लोग” भारत के समाजवादी स्वरूप की अवधारणा को मूर्त करता है, समाज के अंतिम व्यक्ति तक सुविधाओं का वितरण कर उसे आत्मनिर्भर बनाना ही समाजवाद और सामाजिक न्याय को इस सीमा तक लागू नहीं किया जा सकता और निजी स्वार्थवाले वर्गों के हितों को देखा नहीं जा सकता है।
नीलूफर नाजनीन बनाम भारत संघ (एआईआर 1983 एससी 130) के मामले में माननीय उच्चतम न्यायालय ने यह अभिप्रेषित किया कि- समाजवाद का मूल तत्व कमजोरों को और दुर्बलों को जीवन-स्तर को ऊँचा उठाने की बात करता है और उनके उत्थान के लिए आर्थिक सुरक्षा की बात करता है। इसी सिद्धांत के आधार पर अर्ध सरकारी क्षेत्र के कर्मचारियों के वेतन निर्धारण के लिए आयोग गठित किया और सामाजिक न्याय प्रदान किया, जो कि समाजवादी दृष्टिकोण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना गया है।
यह वहीं समाजवाद का रूप है, जिसका सपना हम भारत में देखना चाहते हैं। भारत जैसे विकासशील राष्ट्र में हम भारत के लोगों को तीन वर्गों में —
- उच्च वर्ग
- मध्यम वर्ग
- निम्न वर्ग
भारतीय संविधान वर्ग विभेदिकरण का प्रतिपादन करता है अतः किसी विशेष वर्ग के लिए विशेष दिशा का निर्माण समता का उल्लंघन होगा। ऐसी स्थिति में समाजवाद लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था का हिस्सा अवश्य बन जाती है, जो समाज के प्रत्येक वर्ग की सुरक्षा और विकास की गारंटी प्रदान कर सके।
कहने का तात्पर्य यह है कि यदि वितरणात्मक न्याय की बात करें तो वह सामाजिक रूप से उपयुक्त सिद्धांत है, जिसमें समाज के कमजोर वर्गों को विशेष सुविधा देने के साथ-साथ उच्च वर्ग के लोगों को समाज रूप से प्राप्त होना चाहिए। भारतीय संविधान में हम भारत के लोगों ने ऐसी लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के लिए समाजवादी लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था को अंगीकृत किया।
समाजवाद के लिए स्पष्ट रूप से यह कहा जा सकता है कि किसी वर्ग विशेष के लिए योजना बनाते हैं तो उस वर्ग का प्रभाव सभी वर्गों पर पड़ता है। जैसे अनुसूचित के लिए प्राथमिक शिक्षा का स्तर बढ़ाते हैं तो सरकार के तुष्टीकरण की नीति समाज में विरोध पैदा करती है। समाज के सभी वर्गों को लगता है कि उनके अधिकार का हनन हुआ है। परंतु जब सभी वर्गों को एक समान योजना प्रदान की जाती है और उसके अंतर्गत सभी वर्गों को एक अधिकार मिलता है तो उस वर्ग का वह भारत सरकार के प्रति दृष्टिकोण सही बनता है। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए समान अवसर और समान न्याय की बात भारतीय संविधान ने बार-बार दोहराई है।
और कहा है कि– यही प्रयास है समाज में समता स्थापित हो और कोई भी व्यक्ति इस बात की अनुभूति नहीं कर सके कि उसके साथ कोई भेदभाव किया गया है। यदि भारत के समाज को वास्तव में समाजवादी बनाना है तो सबसे पहले हमें समाज के अंतिम व्यक्ति तक समाजवाद की विचारधारा को पहुँचाना होगा।
समानता के सिद्धांत को वास्तविक रूप देने हेतु संविधान में मौलिक अधिकारों और नीति निर्देशक तत्वों को स्थान दिया गया है। संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 व्यक्तियों को समानता का अधिकार प्रदान करता है।
अनुच्छेद 38 में समाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय की स्थापना की बात कही गई है। इसके साथ ही पिछड़े वर्गों के लिए विशेष व्यवस्था का भी प्रावधान किया गया है।
वास्तविक समाजवाद की परिकल्पना तब ही की जा सकती है जब शासन की योजनाएं समाज के अंतिम व्यक्ति तक लाभ पहुँचा सकें और उसका जीवन स्तर ऊँचा कर सकें।
भारत के लिए यह अत्यन्त आवश्यक है कि समाज के प्रत्येक वर्ग को वह अधिकार और सुविधाएं प्राप्त हो सकें जो समाज में अन्य लोगों को प्राप्त हो रही है।
यही समाजवाद है, जिसमें सरकार का मुख्य उद्देश्य वर्ग और उच्च वर्ग को भी सुविधाओं का अवसर देना आवश्यक होता है।
क्योंकि सभी वर्गों में समाजवाद स्थापित करने के लिये तथा समाज में असमानता की खाई पैदा न हो इसके लिये यह आवश्यक हो जाता है कि विभिन्न वर्ग पनपें ही नहीं, तब ही भोजन तक पहुँचना सुनिश्चित किया जाये। अन्यथा भारतीय संविधान में ही, समाजवाद जैसे पवित्र अवधारणाओं को निरर्थक ही घोषित करना होगा। इस प्रकार भारतीय संविधान में भारत के लोगों द्वारा अपनाया गया समाजवाद के सिद्धांत का निर्वाह करना समय की माँग है।
“हम भारत के लोग और पंथनिरपेक्षता”
भारतीय संविधान के प्रारूप में संविधान की प्रस्तावना में पंथनिरपेक्षता की अवधारणा सम्मिलित नहीं थी। इस अवधारणा को भी 42वें संविधान संशोधन के माध्यम से संविधान की प्रस्तावना में जोड़ा गया है। यद्यपि कि संविधान की उद्देशिका संविधान का मूलभूत तत्व “विचारधारा” को प्रदर्शित करती है। संविधान में धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा संविधान का मूल तत्व है जिसे संविधान की प्रस्तावना में दर्ज किया गया है।
संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 16, 19, 21, 25 एवं 26 में धार्मिक स्वतंत्रता, धर्म, संस्कृति, भाषा, धार्मिक विचारों आदि के लिये अधिकार प्रदान करता है, तथा विधिनियमों के माध्यम से धर्म आधारित किसी प्रकार के भेदभाव को निषिद्ध करता है।
भारत एक बहु-धार्मिक, बहु-नृजातीय तथा बहु-भाषायी राष्ट्र है, जहाँ विभिन्न धर्मों के लोगों के लिये धार्मिक स्वतंत्रता के विशेष अधिकार प्रदान किये गये हैं। भारत का संविधान एक “पंथनिरपेक्ष राज्य” की स्थापना करता है और नागरिकों को यह अधिकार प्रदान करता है कि वे किसी भी धर्म को मान सकते हैं या नहीं भी मान सकते हैं।
संविधान धर्म आधारित राज्य के निर्माण का विरोध करता है, और राज्य का कोई धर्म नहीं होगा, यह घोषणा करता है। यही कारण है कि भारत के नागरिकों को धर्म पर आधारित किसी प्रकार की बाध्यता नहीं है। भारत का संविधान धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत का पालन करता है और यही भावना संविधान की प्रस्तावना में “पंथनिरपेक्ष” शब्द को शामिल करने से उजागर होती है।
राज्य द्वारा कोई भी कार्य इस प्रकार नहीं किया जायेगा, जिससे किसी भी धर्म विशेष के प्रति सम्मान, समर्थन अथवा तिरस्कार की भावना प्रकट हो। भारतीय संविधान में धर्मनिरपेक्षता को मौलिक अधिकारों की रक्षा के रूप में देखा गया है और इसका अर्थ है कि कोई भी व्यक्ति अपनी आस्था, विश्वास और पूजा के तरीके को बिना किसी डर, भय, पक्षपात और भेदभाव के साथ स्वतंत्र रूप से प्रकट कर सकता है।
इस संबंध में एक उदाहरण प्रस्तुत करना अत्यन्त समीचीन होगा। अरुणा राय बनाम भारत संघ एआईआर 2002 एससी 3176 के मामले में माननीय उच्चतम न्यायालय ने यह कहा है कि पंथनिरपेक्षता का सकारात्मक अर्थ है, जिसमें अहस्तक्षेप की नीति को अपनाया जाना चाहिए।
“हम भारत के लोग और संविधान के लक्ष्य”
भारतीय संविधान का मुख्य लक्ष्य इस बात को सुनिश्चित करना है कि भारत के लोगों को निम्नलिखित अधिकारों की गारंटी प्राप्त करना है –
- स्वतंत्रता – सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक
- समानता – विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना
- समता – प्रतिष्ठा और अवसर की
- भाईचारा – व्यक्ति की गरिमा सुनिश्चित करना
हम भारत के लोगों ने संविधान के उद्देश्यों को मूल अधिकार के रूप में भाग-3 में वर्णित किया है और मूल अधिकारों की व्याख्या करते हुए अनुच्छेद 32 के माध्यम से माननीय उच्चतम न्यायालय पर विशेष रूप से विकास किया है।
“हम भारत के लोग और एकल नागरिकता”
हम भारत के लोगों ने संविधान की प्रस्तावना में ही स्वयं को भारतीयता के रूप में प्रस्तुत किया है जहाँ ही हमें निर्माण प्राप्त हो, विभिन्न क्षेत्रो में निवास करने से भिन्नता हो, पारंपरिक परंपराओं का प्रभाव उत्पन्न हुआ हो तथापि हम सब भारतीय हैं।
भारत के संविधान में निवासरत सभी लोगों के लिये एकल नागरिकता का प्रावधान किया गया तथा यह कहा गया कि भारतीय नागरिकता ही हमारी पहचान है, वह किसी जाति, धर्म, लिंग, भाषा अथवा क्षेत्र के आधार पर नहीं बटी है।
यह संविधान की यही भावना है कि देश के लोगों ने स्वयं को “हम भारत के लोग” के रूप में स्वीकार किया और यह दर्शाया कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है, जिसमें प्रत्येक नागरिक को उसकी आस्था, विचार और विश्वास के अनुसार जीवन जीने की स्वतंत्रता प्राप्त है।
इसका कारण है कि संविधान की प्रस्तावना में यह उल्लेख है कि “हम भारत के लोग” अपने आप में एक सशक्त एवं समावेशी विचारधारा को दर्शाता है। क्योंकि भारत के संविधान की प्रस्तावना ने समग्र रूप से निर्माताओं और विशेषतः सभा संविधान के घोष के रूप में जो स्थान मान्यता प्राप्त है वह भारत के लोग हैं न कि किसी जाति या प्रदेश के लोग हैं। यह पूरी समावेशी लोकतंत्र का अच्छा उदाहरण है।
निष्कर्ष
भारतीय संविधान स्रोत निश्चित रूप से हम भारत के लोग हैं, और हम भारत 1 लोगो ने इस ‘संविधान को अगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित किया है। अतः संविधान की प्रस्तावना में संविधान के जो भी आर्दश और लक्य बताये गये हैं, उनके पीछे हम भारत के लोगों की जनभावना निहित है। इसी जनभावना को ध्यान में रखते हये माननीय
उच्चतम न्यायालय के द्वारा कोशवानंद भारती बनाम करल राज्य, ए०आई०आर० १973 एस०सी० 1467 के मामले में “संविधान के मूलभूत ढांचे का सिद्धात प्रतिपादित किया गया और यह कहा गया कि ससद ‘को यह शक्त हैकि वह अनुच्छेद 368 क ‘अन्तगत संविधान की प्रस्तावना संशोधन कर सकती परन्तु संविधान की प्रस्तावना केउस भाग म – सशोधन नहीं किया जा सकता है, जो संविधान के आधारभत ढांचे से सम्बन्धित है। माननीय उच्चतम न्यायालय के द्वारा संविधान के आधारभूत ढांचे को हम भारत के लोगों के द्वारा सकल्पित भाव से आत्मार्पित करने के कारण ही संरक्षित किया गया माननीय उच्चतम न्यायालय के द्वारा अपन अद्यतन विनिश्चिय डा० बलराम सिंहव अन्य वनाम भारत सघ व अन्य निर्णय दिनांक 25 नवम्बर 2024 में यह अभिनिर्धारित किया गया कि वर्तमान रिट याचिका समाजवादी और पंथनिरपेक्ष शब्दों को प्रस्तावना में ‘समाहित करन 40 साल बाद दाखिल की गयी है, जो याची की याचिका को ही संदिग्ध बनाती है। हम भारत के लोग समाजवादी और पंथनिरपेक्षता के अर्थों को व्यापक स्वीकति के बाद अंगीकार किये हैं और हम इसके अर्थ को बिना किसी संदैह के समझते प्रस्तावना में किये गये परिवर्धन ने निर्वाचित सरकारा द्वारा अपनाये गये कानूनों को या नितियों को प्रतिबन्धित या बाधित नही कया है। शर्त यह है कि ऐसी कार्यवाहियां संविधान के आधारभूत ढांचे का उल्लघंन ना करें। 44 वर्ष बाद इस देनेका कोई औचित्य नहीं संवैधानिक स्थिति पूर्व से ही स्पष्ट है।
अविनाश कुमार श्रीवास्तव
मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, हरिद्वार
कोषाध्यक्ष, उत्तराखण्ड जजेज एसोसिएशन
